विद्या भारती 1952 से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान कर रही है और युवा पीढ़ी को भारतीय मूल्यों और संस्कृति के अनुसार शिक्षित करने के लिए प्रतिबद्ध है। भारतीय मूल्यों और संस्कृति के अनुसार युवा पीढ़ी को शिक्षित करने के लिए शिक्षा को एक कला के रूप में मानने वाले कुछ प्रतिभावान और देशभक्त लोगों ने 1952 में गोरखपुर, यूपी में पहला स्कूल शुरू किया। उन्होंने इस शिशु मंदिर-देवी सरस्वती का मंदिर समर्पित किया। बच्चों के लिए जोश, समर्पण और कड़ी मेहनत के लिए धन्यवाद कि इसी तरह के स्कूल अन्य जगहों पर भी स्थापित होने लगे।
उत्तर प्रदेश में ऐसे स्कूलों की संख्या तेजी से बढ़ी। उनके उचित मार्गदर्शन और नियोजित विकास के लिए 1958 में एक राज्य स्तरीय शिशु शिक्षा प्रबंधन समिति का गठन किया गया था। सरस्वती शिशु मंदिरों में अच्छी शिक्षा और अच्छे संस्कारों ने समाज में पहचान, सम्मान और लोकप्रियता अर्जित की।
शिशु मंदिर दूसरे राज्यों में फैलने लगे और कुछ ही वर्षों में कई स्कूल स्थापित हो गए। विभिन्न क्षेत्रों में मामलों के प्रबंधन के लिए राज्य स्तरीय समितियों का गठन किया गया था। 1977 में एक राष्ट्रीय निकाय का गठन हुआ और विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान की स्थापना लखनऊ में अपने पंजीकृत कार्यालय और दिल्ली में कार्यात्मक मुख्यालय के साथ हुई।
सभी राज्य स्तरीय समितियां इस विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान से संबद्ध हैं।
यह स्कूल रामपुरा फूल में मौरिस रोड पर स्थित है। लगभग तीन एकड़ के विशाल क्षेत्र में फैला विद्यालय परिसर शिक्षा की सभी आधुनिक सुविधाएं प्रदान करता है। स्कूल में 63 कमरे, 2 कंप्यूटर लैब, 3 विज्ञान लैब, एक कला कक्ष, संगीत कक्ष, गणित प्रयोगशाला और एक बड़ी लाइब्रेरी है।
इसके अलावा 12 स्मार्ट कक्षाएं, ऑनलाइन कक्षाएं और बच्चों की वैज्ञानिक सोच को बढ़ाने के लिए खेलों की एक विस्तृत श्रृंखला है। इस विद्यालय में भारत सरकार द्वारा बच्चों के लिए ATL (अटल टिंकरिंग लैब) भी स्थापित की गई है।
भारत की आज़ादी से लेकर अब तक शिक्षा के साथ सौतेली माँ का सा व्यवहार होता आ रहा है। यह भी सही है कि सुधार के लिए भारत सरकार ने 1948 से 1986 तक कई कमीशन बनाए। समय-समय पर कई नीतियाँ बनाई, पर इतना सब होते हुए भी शिक्षा की समस्या दिन-प्रतिदिन जटिल व गंभीर होती जा रही है।
शिक्षा इस समय नाजुक दौर से गुजर रही है। विद्यार्थी, माता-पिता, प्रबंधक, अध्यापक कोई भी वर्तमान शिक्षा प्रणाली से खुश नहीं है। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए सर्वहितकारी शिक्षा समिति लगातार प्रयत्नशील रही।
सर्वहितकारी विद्या मंदिर की शुरुआत श्री सुरेन्द्र अत्री जी के प्रयास के साथ 17 नवम्बर 1996 को माता राजो देवी सिलाई केन्द्र में श्री अमृत लाल जी, श्री वीर बहादुर जी, श्री मेघ राज जी व सेवा भारती के प्रधान राकेश गोयल जी, राज कुमार गर्ग जी, राकेश गर्ग जी और कार्यकर्ताओं के साथ एक मीटिंग की गई।
31 जनवरी 1997 को माता राजो देवी सिलाई केन्द्र में मान्यवर श्री कृष्ण मुरारी जी (विभाग प्रचारक बठिंडा) की अध्यक्षता में प्रबंध समिति के लिए बैठक हुई। इस बैठक में सर्वसम्मति से प्रबंध समिति चुनी गई।
श्री अशोक भारती जी, डॉ. शिव दत्त जी व श्री मदन लाल जी का सहयोग समय-समय पर मिलता रहा। इसके बाद संघ के कार्यकर्ताओं एवं नगर निवासियों के साथ मिलकर 5100/- राशि के लगभग 125 सहयोगी सदस्य बनाए गए।
कुछ दानी सज्जनों की ओर से स्कूल को पंखे, वाटर कूलर और पौधे भी दान में दिए गए।
इस बैठक में निम्नलिखित प्रस्ताव पारित किए गए:-
16 अप्रैल 1997 को किराये की इमारत में विद्या मंदिर की शुरुआत हुई। तत्पश्चात 18 अप्रैल 1997 को स्कूल की अपनी इमारत के विषय में चर्चा हुई। इसमें स्वर्गीय लाला कस्तूरी लाल जी के भाई रूप वाले के दोनों पुत्रों, डॉ. पुरुषोत्तम लाल गोयल जी एवं श्री यशपाल गोयल जी ने अपने परम पूज्य पिता स्वर्गीय लाला कस्तूरी लाल जी की पुण्य स्मृति में सर्वहितकारी विद्या मंदिर रामपुरा फूल को एक राशि दान में दी। अतः रामपुरा फूल के सर्वहितकारी विद्या मंदिर का नाम उनके पिता लाला कस्तूरी लाल जी के नाम पर रखा गया।
संघ से प्रेरणा लेकर अपने संकल्प को पूरा करने के लिए रामपुरा फूल सर्वहितकारी विद्या मंदिर की स्थापना 16 अप्रैल 1997 को 68 बच्चों के साथ किराये की इमारत में हुई। उस समय इस विद्या मंदिर के अध्यक्ष श्री राकेश जी तथा प्रधानाचार्य श्री वीर बहादुर गुप्ता जी थे। उनके सतत परिश्रम व मार्गदर्शन में यह विद्या मंदिर उन्नति की ओर अग्रसर हुआ। उस समय विद्यालय में चार कक्षाएँ थीं।
सन 2000 में स्वर्गीय श्री लाला कस्तूरी लाल जी के पारिवारिक सहयोग से इस विद्या मंदिर ने दो एकड़ भूमि पर 9 कमरों का अपना परिसर बनाने का गौरव प्राप्त किया। इसकी नींव संत तिलक राम जी (बालियांवाली) तथा श्री समल सिंह जी (कराड़वाले) ने रखी। इसका श्रेय विद्यालय के मेहनती स्टाफ तथा कर्मठ प्रबंध समिति को जाता है।
उस समय यहाँ नर्सरी से लेकर पाँचवीं कक्षा तक 182 छात्र, 11 अध्यापकों के कुशल मार्गदर्शन में नैतिक, आध्यात्मिक, शारीरिक तथा योग शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। सन 2001 में यह विद्या मंदिर नर्सरी से लेकर छठी कक्षा तक 12 कमरों में 275 छात्रों और 18 अध्यापकों के कुशल मार्गदर्शन में उन्नति की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए आगे बढ़ रहा था।
विकास इस विद्यालय का प्रमुख उद्देश्य सर्वांगीण विकास था। हम प्रातःकालीन प्रार्थना सभा को विशेष महत्व देते थे, क्योंकि इसकी छाप बच्चों के मन-मस्तिष्क पर जीवन भर बनी रहती है। उस समय तीनों माध्यमों—हिंदी, पंजाबी तथा अंग्रेज़ी—द्वारा शिक्षा देने की व्यवस्था थी।
सामाजिक प्रदूषण से बच्चों को बचाने के लिए प्रारम्भ से ही उनमें भाई-बहन की भावना विकसित करना हमारी संस्था का एक सफल प्रयोग रहा। इसके साथ ही अध्यापिकाओं को ‘मैडम’ न कहकर ‘दीदी’ कहने की परंपरा को भी समाज ने सम्मानजनक मान्यता दी।
सन 2004 में यह विद्या मंदिर नर्सरी से लेकर नौवीं कक्षा तक हो गया। उस समय विद्यालय के पास अपनी शानदार इमारत, खुला मैदान, हरियाली और प्रदूषण-रहित वातावरण था। साथ ही विज्ञान प्रयोगशाला, कंप्यूटर लैब, आर्ट रूम तथा एक समृद्ध पुस्तकालय की सुविधा भी उपलब्ध थी।
विद्या भारती के पाँच मूलभूत सिद्धांतों के आधार पर हम अपने विद्यार्थियों को शिक्षित कर उन्हें समाज का एक आदर्श नागरिक बनाने का प्रयास कर रहे थे। हमारे विद्यार्थी किसी भी प्रतियोगिता में भाग लेकर अपना परचम लहराते रहे।
सन 2006 में हमारा विद्यालय शिशु से लेकर दसवीं कक्षा तक हो गया, जिसमें लगभग 650 विद्यार्थी और 35 अध्यापक थे। हमारा विद्या मंदिर अपने क्षेत्र का एक लोकप्रिय और प्रतिष्ठित विद्यालय बन गया था। बोर्ड परीक्षाओं में भी हमारा स्थान शत-प्रतिशत रहा।
सन 2014 में यह विद्या मंदिर 2.5 एकड़ के विशाल क्षेत्र में फैल गया, जिसमें 54 कमरे, 3 विज्ञान प्रयोगशालाएँ, 2 कंप्यूटर लैब, एक आर्ट रूम तथा एक विशाल पुस्तकालय था। उस समय विद्यालय में शिशु से लेकर +2 तक की कक्षाएँ चल रही थीं, जिसमें लगभग 1670 विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त कर रहे थे।
हम अपनी वार्षिक योजना के अनुसार समय-समय पर विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन करते रहते हैं। समाचार पत्रों में भी हमारे विद्या मंदिर की गतिविधियाँ छपती रहती हैं।
विद्या मंदिर के प्रधानाचार्य श्री एस. के. मलिक जी के मार्गदर्शन में विद्या मंदिर विकास की यात्रा के नए सोपान पर चढ़ता गया। उनके प्रयासों से शिक्षा की गुणवत्ता में लगातार सुधार की प्रक्रिया होती रही। सभी विषयों के H.O.D. बनाए गए।
अलग-अलग विंग में अध्यापकों को दायित्व देकर उनकी प्रतिभा के विकास में वृद्धि हुई। उनके प्रयासों से हमारे विद्या मंदिर को अटल टिंकरिंग लैब मिली।
इन्हीं के प्रयासों से हमारे स्कूल को वर्ष 2020 में CBSE की मान्यता प्राप्त हुई। कोविड काल के कठिन समय के दौरान भी स्कूल में बच्चों की संख्या गिनती सही रह सकी।